04 Feb, 2014 10:18a.m.

50 फीसदी डीए को मूल वेतन में जल्द ही मर्ज करने की है तैयारी

केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनरों तथा इनके परिवारजनों के तकरीबन ढाई करोड़ वोटों पर अब सरकार की नजर है। तकरीबन 38 लाख कर्मचारियों और 25 लाख पेंशनभोगियों को लुभाने के लिए शीघ्र ही 50 फीसदी महंगाई भत्ता (डीए) को मूल वेतन में मर्ज करने की तैयारी है।

इसका फैसला अगले पखवाड़े हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो सरकारी खजाने पर लगभग 20,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

इसे ट्रेड यूनियन से जुड़े पदाधिकारियों का दबाव कहें, रेलवे समेत सभी केंद्रीय कर्मचारियों के अनिश्चितकालीन हड़ताल की धमकी या फिर ढाई करोड़ वोटरों को लुभाने की कोशिश कहें, लेकिन सच्चाई यही है कि डीए मूल वेतन में मर्ज हो रहा है। तकरीबन 12 लाख कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन एआईआरएफ के महासचिव शिव गोपाल मिश्रा का कहना है कि पिछले दिनों ही उन्होंने इस बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय से पत्राचार किया है। वह इस सिलसिले में व्यय सचिव से भी मिले थे।
संकेत यही है कि जब लेखानुदान के लिए संसद का सत्र चलेगा, तभी इसकी घोषणा कर दी जाएगी। नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवेमैन के प्रेस सचिव एस एन मलिक ने पीएमओ के सूत्रों के हवाले से बताया कि इस बारे में केबिनेट नोट बन गया है। इससे संबंधित फाइल इस समय पीएमओ में पड़ी है। अगले सप्ताह जब संसद का सत्र शुरू होगा, तभी किसी दिन इसकी घोषणा हो जाएगी।

गौरतलब है कि इस समय केंद्रीय कर्मचारियों का डीए 90 फीसदी तक पहुंच गया है और एक जनवरी को ही फिर से डीए में बढ़ोतरी ड्यू हो गई है। यदि इस बार भी डीए में ११ फीसदी की वृद्धि होती है तो डीए १०१ फीसदी हो जाएगा। मलिक का कहना है कि पांचवें वेतन आयोग के समय जब कर्मचारियों का डीए ७२ फीसदी पर पहुंचा था, तभी बिना कहे ५० फीसदी डीए मूल वेतन में मिला दिया गया था। इस बार ऐसा नहीं किया जा रहा है। ५० फीसदी डीए को मूल वेतन में मिलाने की यूनियनों की मांग पुरानी है। इसे देखते हुए पिछले साल अगस्त में वित्त राज्य मंत्री नमो नारायण मीणा ने संसद में बयान दिया था कि छठे वेतन आयोग ने मूल वेतन में डीए नहीं मिलाने की सिफारिश की है। इसलिए सरकार ऐसा नहीं कर रही है। हालांकि, अब स्थिति में परिवर्तन हो गया है, आम चुनाव को देखते हुए तमाम लोक-लुभावन फेसले लिए जा रहे हैं। इसी कड़ी में यदि डीए को मूल वेतन में मिलाया जाता है तो सरकारी खजाने पर करीब २०,००० करोड़ रुपये का बोझ पड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।
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